डाक्टर दीन दयाल उपाध्याय -एक महान मानवतावादी राजनीतिज्ञ

डाक्टर दीन दयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितम्बर 1916 को उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के नगलाचंद्रभान गांव में हुआ।  1919 में इनके पिता श्री भगवती प्रसाद की मृत्यु हो गई। शायद शुक्र -राहु की दशा थी (10..-05 -1919 से 10-05 -1922) महादशानाथ व अन्तर्दशानाथ दोनों ही PACद्वारा आठवें भाव से सम्बन्धित हैं। आठवां भाव पिता के भाव से बारहवां भाव है। 1924 में शायद शुक्र -गुरु की .दशा में (10 -05 -1922 से 08-09 -1925 ) में इनकी माता का भी निधन हो गया। चतुर्थ स्थान माता का होता है। शुक्र वहां से अष्टमेश है1गुरु वक्री होकर वहां से द्वितीय भाव में है। 

जातक तत्त्व के चतुर्थ विवेक के श्लोक 17 का अर्थ है कि लग्न ,चतुर्थ और नवम भाव के स्वामी केंद्र या त्रिकोण में हों तो माता-पिता की मृत्यु हो जाती है। 

चतुर्थेश पर शनि और मंगल की दृष्टि के कारण चतुर्थेश पीड़ित है। चतुर्थ भाव में द्विस्वभाव राशि है। चतुर्थेश की अष्टमेश चंद्रमा पर दृष्टि है। इसी कारण से इन्हेँ गोद जाना पड़ा और इनका लालन पोषण इनके मामा ने किया। नवांश में भी चतुर्थेश शनि राहु -केतु अक्ष में होने के कारण पीड़ित है हालांकि दसवें भाव में होने के कारण वह अपने भाव को देख रहा है। 

1936 या 1937 में इन्होंने बिरला कॉलेज पिलानी से इंटर की परीक्षा स्वर्ण पदक के साथ पास की। यह परिक्षा उन्होंने शायद सूर्य -बुध की दशा में (27-12-1935 से 02-11-1936)  पास की। डी-1 में दोनों माध्यमिक शिक्षा के भाव को दशम भाव से देख रहे हैं।D-9 में सूर्य शिक्षा के पांचवें भाव में है और बुध एकादश भाव से इसे देख रहा है। डी -24में सूर्ये लग्न में है और बुध माध्यमिक शिक्षा के चतुर्थ भाव में है।यह इस दिखाता है कि इन्होंने इंटर की परीक्षा 1936 में पास की। 1939 में इन्होंने सनातन धरम कॉलेज कानपुर से स्नात्तक की परीक्षा पास की। शायद चंद्र -मंगल की दशा में (11-12 -1938 से 12 -07 -1939 तक) डी – 1 अन्तर्दशानाथ मंगल पंचमेश होकर पंचम भाव को देख रहा है। महादशानाथ चंद्रमा शिक्षा के वैकल्पिक नवम भाव में है। नवमांश में महादशानाथ चंद्रमा नवमेश है। अन्तर्दशानाथ मंगल पांचवें भाव में है। डी -24 में अन्तर्दशानाथ मंगल शिक्षा के वैकल्पिक नवम भाव में है। 

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 1940 के मध्य में  दीन दयाल उपाध्याय जी ने साप्ताहिक पत्रिका पांचजञ्जय और राष्ट्रधर्म और बाद में दैनिक पत्रिका स्वदेश का प्रकाशन लखनऊ से शुरु किया। दशा थी, चंद्र-राहु की (12-07-1939 से 10-01-1941तक)1 डी -01 में चंद्र प्रकाशन के नवम भाव में है और राहु पढ़ने लिखने,साहित्य और सर्जन के भावेश मंगल द्वारा द्रिष्ट है। डी -09 में चंद्र नवमेश (जहां पंचमेश बृहस्पति बैठा है ) है और राहु उसके द्वारा दृष्ट है। डी -24 में राहु नवम भाव में हैऔर पंचमेश बुध लग्नेश शनि द्वारा दृष्ट है। 

1942 में श्री दीन दयाल उपाध्याय राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के पूर्णकालिक प्रचारक बन गए। दशा थी चंद्र – गुरु की (10-05-1941से 12 -05 -1942 तक) 1 गुरु प्रचार के नवम स्थान को देख रहा है जहां चंद्र बैठा है। नवांश में गुरु नवम भाव में चंद्रमा की राशि में है। 

21 सितम्बर 1951 को उन्होंने उत्तर प्रदेश में एक राजनैतिक सम्मलेन बुलाया और एक नए राजनैतिक मोर्चे की स्थापना की। इसके एक माह बाद 21 अक्टूबर 1951 को श्री श्यामा प्रसाद मुकर्जी की भारतीय जनसंघ पार्टी की स्थापना में सहायता की। दशा थी मंगल -बुध की। डी -1 में  दशानाथ मंगल लग्नेश गुरु को एकादश भाव से देख रहा है जो की पंचम भाव में है। अन्तर्दशानाथ बुध राजनीति से सम्बन्धित ग्रह सूर्ये के साथ दशम भाव में है। नवांश में मंगल-बुध परस्पर दृष्टिगत हैं और मंगल लग्नेश है। दशमांश में मंगल दशमेश है और बुध और राजनीति से सम्बन्धित ग्रह सूर्ये के साथ दृष्टि सम्बन्ध बनाए हुए है। 

1965 में शायद राहु -बुध की दशा (22 -01-1963 से 11-08-1965) में उन्होंने केरल के कालीकट सम्मलेन में समग्र मानवतावाद  के रुप में अपनी राजनैतिक और आर्थिक विचारशैली प्रस्तुत की  जिसे भारतीय जनसंघ पार्टी ने अपने औपचारिक कार्येक्रम  के रुप में स्वीकार किया। दिसम्बर1971 में कालीकट के ही एक सम्मलेन में शायद राहु -चंद्र की दशा में (24-07-1970 से 22-01-1972 तक )उन्हें भारतीय जनसंघ पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया।डी -1में राहु द्वितिय स्थान में पंचमेश मंगल द्वारा दिष्ट है। मंगल लग्नेश गुरु को भी देख रहा है।लग्न व पंचम दोनों ही भाव सम्मान, प्रतिष्ठा और यश से संबन्धित हैं। डी -09 में सम्मान का दसवां भाव राहु -केतु अक्ष में हैं और चंद्रमा दशम भाव में है।डी -10 में दसवां भाव राहु -केतु अक्ष में है और चंद्रमा पदप्राप्ति के सप्त्म भाव में है।10 -11 फरवरी   

की रात को वे रहस्मयी परिस्थितियों में 52 वर्ष की आयु में उत्तर प्रदेश के मुग़लसराय में रेलवे लाइन के नजदीक मरे हुए पाए गए। दशा थी राहु -शुक्र-राहु (26-09-67से 08-03-68 तक) की।डी -1 में राहु दूसरे भाव में है जो की एक मारक भाव है।अन्तर्दशानाथ शुक्र मारकेश शनि के साथ है। डी -9 में मारकेश शुक्र राहु -केतु अक्ष में है।डी -3 चार्ट में शुक्र 2  22 वें द्रेष्कोण में है। मारकेश शनि राहु -केतु अक्ष में है। 

उस वक्त की जनसंघ और अब की भारतीय जनता पार्टी का मत है की उनकी मृत्यु स्वाभाविक नहीं है और उन्हें षड्यंत्र के तहत मारा गया। मेरी राजनीति में कोई रूचि नहीं है लेकिन डी -1 में अन्तर्दशानाथ शुक्र शत्रु भाव का स्वामी होकर रहस्य के आठवें भाव में है। महादशानाथ राहु को द्वादशेष मंगल देख रहा है। इस प्रकार महादशानाथ व अन्तर्दशानाथ का  छह ,आठ व बारहवें भाव से सम्बन्ध ज्योतषीय दृष्टि से भारतीय जनसंघ के आरोप की संभावना से इन्कार भी नहीं करता। 

उनकी यह संक्षिप्त जीवन कथा इण्टरनैट में उपलब्ध उनके जीवन के आंकड़ों के अनुसार लिखी गई है।  

 

 

 

 

 

   

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

  

How useful was this post?

Click on a star to rate it!

Average rating 0 / 5. Vote count: 0

No votes so far! Be the first to rate this post.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *