जन्मकुंडली के फलादेश में ग्रहों से बनने वाले योगों का बहुत महत्व होता है। आज हम ऐसे ही कुछ योगों का और उनसे प्राप्त होने वाले फल का वर्णन करेंगे। लोग आम तौर पर ऐसे ग्रह योगों को पूर्ण रूप से नहीं समझते और अपनी जन्मकुंडली का गलत फलादेश करके बाद में वह फल प्राप्त न होने पर निराशा अनुभव करते हैं या फिर ज्योतिषशास्त्र को ही गलत मानना शुरू कर देते हैं।
ऐसा ही एक योग होता है गजकेसरी योग। श्री के एन राव के अनुसार प्रतिमास बीस प्रतिशत से तैतीस प्रतिशत व्यक्ति गजकेसरी योग अपनी जन्मपत्रियों में लेकर पैदा होते हैं। पंडित सीता राम झा कृत बृहत्पाराशर होरा शास्त्र केअध्याय 37 श्लोक 3 -4 में गजकेसरी योग की परिभाषा इस प्रकार दी है। “लग्न अथवा चंद्रमा से यदि गुरु केंद्र में हो और शुभग्रह मात्र से दृष्ट युत हो तथा यदि अस्त ,नीच और शत्रु राशि में नहीं हो तो गजकेसरी नामक योग होता है। फल स्पष्टार्थ है। ” पंडित सीताराम झा ने इसके फल विस्तार से नहीं बताए हैं। परन्तु श्री गोपेशकुमार ओझा ने जातकपारिजातअध्याय 7 श्लोक 116 -117 के अनुवाद में लिखा है ,” जो गजकेसरी योग में उत्पन्न होता है,वह धान्य सहित मेधावी ,गुणसम्पन्न और राजा का प्रिय करने वाला होता है।(राजा का प्रिय करेगा तो राजा की कृपा उस पर होगी ,फलतः धन ,धान्य ,समृद्धि ,अधिकारादि की वृद्धि होगी। ) उपर कहा गया है कि गुरु ,अस्त ,नीच और शत्रु राशि में नहीं होना चाहिए। श्री के एन राव के अनुसार गुरु वक्री और अशुभ ग्रह द्वारा दृष्ट भी नहीं होना चाहिए। गजकेसरी योग का प्रभाव गुरु और चन्द्रमा की दशा में विशेष रूप से होता है। गजकेसरी योग का व कुंडली में उपस्थित सभी योगों का अध्ययन करते समय हमें लग्न /लग्नेश का बल व उन पर शुभ- अशुभ प्रभाव को अवश्य देखना चाहिए क्योंकि कुंडली में उपस्थित सभी योगों का प्रभाव लग्न के बल व शुभता पर निर्भर करता है। इसी तरह चंद्रमा का भी स्वतंत्र रूप से अध्ययन करना चाहिए और यह देखना चाहिए की चंद्रमा गडांत या केमद्रुम योग में या पाप ग्रहों के प्रभाव में तो नहीं है।
इससे पहले की हम गजकेसरी योग को जन्मपत्रियों के व्यावहारिक उदाहरणों से समझें हमें एक ओर योग के बारे में जानना चाहिए।पंडित सीता राम झा कृत बृहत्पाराशर होरा शास्त्र केअध्याय 38 श्लोक 12 के अनुसार यदि चंद्रमा के साथ में या उससे 2 ,12 स्थान में तथा लग्न में सूर्य को छोड़कर अन्य कोई ग्रह नहीं हो तो केमद्रुम नामक योग होता है। उसमें निन्दित ,विद्या ,बुद्धि से रहित और दरिद्र का जन्म होता है। महाऋषि पाराशर के अनुसार शुभाशुभ चंद्रयोग अन्ययोगों के फलों को नाश करके अपना फल देते हैं। इसलिए पहले इसी को देखना चाहिए।
जातक पारिजात में कहा गया है की यदि सुनफा ,अनफा ,दुरुधरा इन तीनों में से कोई भी योग न हो तो केमद्रुम योग होता है ,इसका फल दरिद्रता है। जातक पारिजात के रचायता ने चंद्रमा के साथ कोई ग्रह होने के बारे में कोई बात नहीं की है। जातक पारिजात में और भी कई ग्रह स्थितियां बताई गई हैं जो केमद्रुम योग बनाती हैं। केमद्रुम योग भंग होने के कई योग भी ज्योतिष ग्रंथों में दिए गए हैं। कोई भी योग होने पर अपने कुछ फल जरूर देता है चाहे वह भंग ही क्यों न हो गया हो। केमद्रुम योग होने पर जातक दुःख ,असफलता ,खराब स्वास्थ्य और अपने स्टेटस में गिरावट जरुर महसूस करता है।केमद्रुम योग होने पर जातक को धन व पद की हानि का सामना भी अवश्य करना पड़ता है।
केमद्रुम योग के इलावा गजकेसरी योग का फलादेश करते समय हमें कई बातों को देखना चाहिए जैसे योग बनाने वाले ग्रह किन राशियों में हैं ,किन भावों में हैं ,वे किन भावों के स्वामी हैं ,योग बनाने वाले ग्रहों पर दूसरे ग्रहों का प्रभाव ,घटक ग्रहों का बल , भिन्न भिन्न वर्गों में उनकी स्थिति ,उनकी प्रकृति व उनके साथ जो ग्रह हैं उनका आकलन। यह बात अन्य ग्रह योगों पर भी लागु होती है।
अब हम कुछ कुंडलियों द्वारा गजकेसरी योग को समझने का प्रयास करते हैं। नीचे दी गई कुंडली में बृहस्पति चन्द्रमा से केंद्र में है।
बृहस्पति अष्टमेश और एकादशेश हो कर नवम भाव में अपनी नीच राशि में है। वृष लग्न के लिए बृहस्पति एक अशुभ ग्रह है। चन्द्रमा तीसरे भाव का स्वामी होकर द्वित्येश -पंचमेश बुध के साथ द्वादश भाव में है। चन्द्रमा भी वृष लग्न के लिए अशुभ ग्रह है। लग्नेश शुक्र न केवल सूर्ये से अस्त है बल्कि राहु -केतु अक्ष में भी है। लग्नेश शुक्र पर यह अशुभ प्रभाव व लग्नेश शुक्र का अस्त होना गजकेसरी योग के शुभ प्रभाव को कम करने वाला है। इस व्यक्ति के जीवन में अभीतक गजकेसरी योग का शुभ प्रभाव दृष्टिगोचर नहीं हुआ।स्नातकोत्तर तक शिक्षा ग्रहण करने के बावजूद 28 वर्ष की आयु में इन्हे शिक्षा विभाग में ग्रुप ‘डी ‘ की नौकरी ही प्राप्त हुई। पंचमेश बुध व सप्तमेश मंगल दोनों शुक्र के नक्षत्र में हैं। इसलिए ये प्रेम विवाह चाहते हैं। पर सप्तमेश मंगल चतुर्थ भाव में है और शुक्र न केवल सूर्ये से अस्त है बल्कि राहु -केतु अक्ष में भी है। अतः वैवाहिक जीवन ज्यादा सुखद रहने की संभावना नहीं है। चंद्रमा की दशा नवंबर 2025 में ही समाप्त हुई है। चंद्रमा की दशा में इन्हें शुभ प्रभाव के नाम पर केवल ग्रुप ‘डी ‘ की नौकरी ही प्राप्त हुई है। गुरु की दशा 53 वर्ष की आयु में नवंबर 2050 में शूरू होगी। बृहस्पति अष्टमेश और एकादशेश हो कर नवम भाव में अपनी नीच राशि में है।अतः इस दशा में भी शुभ फल प्राप्त होने की आशा नहीं है। इस प्रकार इस व्यक्ति को गजकेसरी योग का कोई शुभ प्रभाव अपने जीवन में प्राप्त होने की संभावना नहीं है।
अब हम एक और जन्मपत्री देखते हैं। इस जन्मपत्री में गजकेसरी योगऔर केमद्रुम योग दोनों हैं। जन्मपत्री नीचे दी गई है। इस जन्मपत्री
में भी गुरु चंद्र की युति नवम भाव में है यानि के गुरु चंद्र से केंद्र में है।चंद्रमा के अगल बगल के भावों में कोई ग्रह न होने के कारण चंद्रमा केमद्रुम योग में है।हालांकि लग्न से केंद्र में ग्रह होने के कारण केमद्रुम योग भंग भी है। श्री के एन राव ने चंद्रमा के केमद्रुम योग में होने को गजकेसरी योग का गंभीरतम दोष माना है। नवम भाव के एक तरफ शनि -मंगल की दृष्टि है जबकि दूसरी और मंगल की दृष्टि है।जब इस व्यक्ति ने मुझ से सलाह ली तो इस पर गुरु की महादशा बुध की अंतर्दशा चल रही थी। बुध केन्द्राधिपत्य दोष से युक्त है ,लग्नाधिपति व महादशा अधिपति का शत्रु ग्रह है तथा सूर्ये से अस्त है।उसने मुझ से व्यवसाय मंदा चलने के बारे में सलाह ली थी। मैंने उसे विष्णु सहस्त्रनाम का नित्यपाठ करने का सुझाव दिया। इस प्रकार गुरु -बुध की दशा में गजकेसरी योग होते हुए भी उसे अच्छा फल प्राप्त नहीं हुआ। इससे पता चलता है कि केवल कोई एक अच्छा (गजकेसरी योग) योग देख कर हमें फलादेश करने के सामान्य नियमों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
आइए गजकेसरी योग की एक और कुंडली देखते हैं। इस व्यक्ति को गुरु की महादशा में भाग्य ने बिल्कुल साथ नहीं दिया और अंत में उसे गुरु -केतु की दशा में अपना व्यवसाय बंद करना पड़ा।
आइए सबसे पहले हम इस जन्मपत्री में व्यवसाय में संकट पैदा करने वाले ग्रहयोगों को देखते हैं।दशम भाव में चन्द्रमा केमद्रुम योग में है हालांकि लग्न से केंद्र में ग्रह होने के कारण केमद्रुम योग भंग भी है। लग्न में सूर्ये और शनि का सम्बन्ध है। शनि का सूर्य या मंगल से सम्बन्ध हो तो व्यवसायिक बाधाएं आती है। दशमेश का संबंध अष्टमेश से भी है।चन्द्रेश ,लग्नेश व दशमेश के नवांशेश पीड़ित हैं।इंदु लग्न वृष है जो राहु -केतु अक्ष में होकर पीड़ित है।



जन्मकुंडली का आत्मकारक बुध है और अमात्यकारक सूर्ये है। डी – 9 में ये एक दूसरे से 2 /12 स्थान पर हैं। यह व्यवसाय में संकट का संकेत है।नवांश में दशमेश व सप्तमेश अष्टम भाव में राहु -केतु अक्ष में है। दशांश में दशमेश चतुर्थ भाव में द्वादशेश से दृष्ट है। इस प्रकार डी – 1 ,डी – 9 और डी – 10 तीनों कुंडलियों में दशमेश का सम्बन्ध त्रिक भावों से बना हुआ है।
सातवां भाव व्यापार (Business) को भी दर्शाता है। इस कुंडली में सातवां भाव षड्बल में बहुत कमजोर है। यह व्यापार में अस्थिरता को दिखाता है। दशम भाव में ज्ञातिकारक बृहस्पति है। यह भी व्यवसाय में समस्या दिखा रहा है।
राहु की महादशा में शनि ,बुध व केतु की अंतर्दशाएं इस जातक के लिए नुकसान दायक रही । राहु -शनि की दशा को एक रहस्मयी (enigmatic) दशा कहा जाता है। वैसे भी शनि वृश्चिक लग्न के लिए अशुभ ग्रह है। बुध व केतु पंचधा मैत्री में राहु के शत्रु ग्रह हैं और वृश्चिक लग्न के लिए भी अशुभ ग्रह हैं ।स्वाभाविक रुप से इनसे शुभ फल की आशा कैसे कर सकते हैं ? उसके बाद राहु -मंगल की दशा में उसे बहुत भारी नुकसान उठाना पड़ा। मंगल द्वादश भाव में है और राहु -मंगल की परस्पर स्थिति दो -बारह (2 /12 ) की है। यह दशा- छिद्र का समय भी है।
गुरु -शनि की दशा में उसे अपना मकान बेचना पड़ा ।ज्योतिष के अनुसार मकान बेचने में तीसरे,पांचवें व दसवें भाव /भावेश ,मंगल व शनि की दशाओं की विशेष भूमिका रहती है। गुरु पंचमेश होकर दशमस्थ है व शनि तीसरे (व चौथे )भाव का स्वामी है। तीसरे ,पांचवे -दसवें भाव /भावेशों से मंगल या शनि का संबन्ध होने पर व्यक्ति भू -सम्पति अवश्य बेचता है। इस कुंडली में शनि तीसरे भाव का स्वामी होकर दशम भाव को देखता है।मंगल का भी तीसरे भाव से दृष्टि सम्बन्ध बना हुआ है।
ऊपर लिखा गया है कि गुरु -शनि की दशा में उन्हें अपना मकान बेचना पड़ा। गुरु की अन्य अंतर्दशाएं भी जातक के लिए शुभ नहीं रही।
फरवरी 2019 में उन्हें दिल का दौरा पड़ा। दशा थी गुरु -बुध -शनि की-29 -12 -2018 से 09 -05 -2019 तक।दिल का दौरा तब पड़ता है जब जन्मकुंडली में कर्क राशि , सिंह राशि ,चतुर्थ भाव ,पंचम भाव ,सूर्ये और चंद्र पीड़ित हों या बहुत कमजोर हों।यदि सूर्ये पापग्रहों के साथ वृश्चिक राशि में हो तो हृदयशूल होती है। सूर्ये वृश्चिक राशि में होने पर दिल में घबराहट भी होती है। इस कुंडली में सूर्ये शनि के साथ राहु -केतु अक्ष में है। चंद्रमा शनि द्वारा दृष्ट है। सिंह राशि पर शनि की दृष्टि है।कर्क राशि पर राहु की नौंवी दृष्टि है। चतुर्थ भाव के एक तरफ मंगल और शनि की दृष्टि है। दूसरी तरफ राहु की पांचवी दृष्टि है। इस प्रकार चतुर्थ भाव के दोनों तरफ पाप प्रभाव है। पांचवा भाव राहु की दृष्टि के कारण पीड़ित है। इस प्रकार इस कुंडली में हृदयरोग के सभी कारक मौजूद हैं।
इसके बाद परिवार द्वारा इन्हें हर प्रकार की व्यापारिक गतिविधियों से अलग कर दिया गया। 2020 व 2021 में इन्हें करोना भी हुआ। अब यह जातक एक प्रकार से सेवानिवृति का जीवन जी रहा है।
उक्त कुंडली में दशम भाव में गजकेसरी योग है। इस कुंडली में केमद्रुम योग भी है।दशम भाव पर शनि की दृष्टि भी है। वृश्चिक लग्न के लिए शनि अकारक ग्रह है। केमद्रुम योग ,अकारक शनि की दृष्टि तथा व्यवसाय में संकट पैदा करने वाले ग्रहयोगों के कारण गजकेसरी योग के होते हुए भी गुरु-केतु की दशा में जातक को अपना व्यवसाय बंद करना पड़ा।
गजकेसरी योग और केमद्रुम योग से होने वाले फल को समझने के लिए एक और कुंडली देखते हैं। नीचे दी गई कुंडली के जातक ने
भी स्नातकोत्तर तक शिक्षा ग्रहण की फिर भी इसे इकतीस वर्ष की आयु में शनि -बुध की दशा में लिपिक की नौकरी ही मिल सकी। दसवें भाव गुरु -चंद्र की युति से गजकेसरी योग बन रहा है। लेकिन इस योग पर शनि की दृष्टि है। शनि स्वयं अकारक मंगल से दृष्ट है। शनि -मंगल परस्पर दृष्टि संबंध बनाए हुए हैं। गुरु केन्द्राधिपति योग से ग्रस्त है। चंद्र न केवल केमद्रुम योग में है बल्कि मृत्यु भाग में भी है। इससे भी यही पता चलता है कि केवल कोई एक अच्छा (गजकेसरी योग) योग देख कर हमें फलादेश करने के सामान्य नियमों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
अगले लेखों में हम अन्य ग्रह योगों का अध्ययन करेंगे ताकि हमें कुंडलियों का सटीक फलादेश करने में निपुणता प्राप्त हो सके।